बुधवार, 21 अगस्त 2024

कबीरदास का जीवन परिचय।



संत कवि कबीरदास जी भक्तिकाल के ज्ञानश्रीय शाखा कवि थे। कबीरदास जी ने जो भी कह दिया वही उनकी रचना बन गई, उन्होने तत्कालिन समय में उपस्थित समाज में की असामाजिक तत्व को चोट देने का काम किया जिससे समाज को सदगति मिल पाए इस अनुसार कबीरदास जी एक समाज सुधारक भी थे।

कबीरदास जी भक्तिकाल के शिरोमणि कवि के रूप में ख्याति प्राप्त किए परंतु दुर्भाग्य यह है कि उनके जीवनवृत से संबंधित प्रमाणों अथवा साक्ष्यों के अभाव के कारण विद्वानों में मतैक्य नही है।

अचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा डॉ०श्यामसुंदर दास के अनुसार कबीरदास का जन्म काल 1456 वि संवत माना तथा निधन काल 1557 वि संवत माना। जबकि डॉ०राजकुमार वर्मा के अनुसार जन्म काल 1455 वि संवत माना तथा निधन काल 1551 वि संवत माना , डॉ०पारसनाथ तिवारी ने कबीरदास जी का जन्म काल 1462 वि संवत तथा निधन काल 1575 वि संवत माना ।

अतः हम विभिन्न विद्वानों के अधार पर कबीरदास जी का जीवन परिचय जान सकते हैं।

(क) अंतसाक्ष्य 

(ख) बाह्यसाक्ष्य

(ग) किवदंती व जनश्रुति


(क) अंतसाक्ष्य: अंतसाक्ष्य के अन्तर्गत कबीरदास जी का विभिन्न प्रकार के दोहा शामिल है जिसके माध्यम से कबीरदास का परिचय उजगार होती है।

जैस:- 
(1) जन्म: काशी (उत्तरप्रदेश वाराणसी)
कबीर पंथियों में प्रचलित दोहों के अनुसार उनका जन्म से संबंधि बातों का पता चलता है:- 

"सांवत बारह सौ पाँच में ज्ञानी कियो विचार।
काशी में प्रगट भयो,शब्द कहो टकसार।

कबीर के और एक दोहे में कहा गया है:- 
 
"चौदह सौ पचपन साल गए, चंदवार एक ठाट ठाए।
जेठ सुदी बरसायत को, पूर्णमासी प्रगट भए।
घन गरजे दमनी दमके, बूंदे बरसे झरलाग गए 
लहर तालाब में कमल खिलि है, तहँकबीर भानूप्रकाश भए।"

डॉ०पारसनाथ तिवारी प्राप्त शिलालेख के अनुसार जन्म संवत 1462 माना।

(2) निधन: मगहर 
डॉ०श्यामसुंदर दास, अचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ०राजकुमार वर्मा ने कबीरदास का निधन काल संवत 1575 माना। एक दोहे के माध्यम से यह सर्वमान्य है जो इस प्रकार है:- 
"सांवत पन्द्रह सौ पछन्तरा , कियो मगहर को गावन ।
  माघ शुदी एकादशी, रासो पवन में पवन।।"
मान्यता है कि कबीरदास का मृत्यु मगहर में हुआ।

(3) जाति:- जुलाहा 

निम्नलिखित दोहे से पता चलता है कि संत कवि कबीरदास जी जुलाहा थे तथा उनके वहां ताने- बाने का काम होता था।


"गुर परसग्दी जदै ऊनामा 
भगति के प्रेम इन्हहि नहै जाना ।।"
 

(4) शिक्षा:- 

संत कवि कबीरदास जी का शिक्षा के बारे कहा जाए तो वे पढ़े-लिखे नहीं थे या अनपढ़ थे तथापि वे प्रतिभा के इतने धनी थे कि उन्होने जो कह दिया वही उनकी रचना बन गई, कबीरदास जी ने जो भी कहा उसे उनके शिष्य धर्मदास ने लिख लिया जिसको हम बीजक के नाम से जानते हैं ।
शिक्षा से संबन्धित उनका एक दोहा इस प्रकार है:- 

" कागद छुओ नहिं , कलम गही नही हाथ ।
चारिक जुग को महतम , मुखहिं जनाई बात ॥"

(ख) बाध्यसाक्ष्य:-

बाह्यसाक्ष्य के अंतर्गत कबीरदास जी कराजनिकाल तथा जीवनवृत के संबंध में उल्लेख मिलता है। भक्तमाल  में कबीरदास से संबंधि जो छाप्य मिले उससे ज्ञात होता है कि कबीरदास जी  भक्तमाल के रचना से पूर्व ही अस्तित्व में आ गए थे। उनके गुरु रामानंद जी थे, उनकी दीर्घायु 120 वर्ष की थी,कुछ बातों का पता अनंतदास  की रचना कबीर साहब की परचई रचना काल संवत 1842 के अनुसार सामने आई । आईन-ए-अकबरी ' अबुल फजल रावनाकाल वि संवत 1655 के अनुसार कबीरदास जी हिंदू और मुस्लिम दोनो के पूज्य थे उनके अंतिम संस्कार के लिए दोनो पक्ष में विवाद हुआ।

(ग) किवदंती व जनश्रुति

(5) माता - पिता:- नीरू - नीमा 

 प्रचलित किवदंती व जनश्रुति के अधार पर कबीरदास के संबंध में यह ज्ञात होता है कि एक विधवा बाह्मणी की सेवा से प्रसन्न होकर स्वामी रामानंद जी से पुत्रवती होने का अवसर प्राप्त हुआ किंतु लोक लज्जा के भय से उस बच्चे को फेक आई जिसे नीरू-नीमा नामक जुलाहे दंपति ने पालन-पोषण किय। 




रविवार, 14 फ़रवरी 2021

कबीरदास का समाज दर्शन।


संत कवि कबीरदास जी 15वी सदी का एक कवि होने के साथ - साथ एक समाज सुधारक भी थे, उन्होंने समाज में उपस्थिति विभिन्न प्रकार के समाज विरोधी तत्त्वों का खंडन कर समाज को उचित दिशा में ले जाने का प्रयास किया है।
संत कवि कबीरदास जी, समाज में उपस्थिति विभिन्न प्रकार के समाज विरोधी कुरीतियां तथा भेदभाव जैसे - ऊँच-नीच, जाति-पाति , धार्मिक आडम्बर रुढ़िवादिता का घोर विरोधी थे ।

कुरीति, अनीति ,भेदभाव का खंडन, कबीरदास का समाज में योगदान है और इसलिए कबीरदास का समाज दर्शन की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
 कबीरदास जी सभी को एक ही परमात्मा का संतान मानते हैं उनके दृष्टि से कोई बड़ा या छोटा जन्म या जात से नही बल्कि कर्म से होता है।
कबीरदास जी ने प्रेम का बड़ा महत्व समाज की उन्नति के लिए दिया है अर्थात विभिन्न प्रकार की आपसी मतभेद को छोड़ कर मनुष्य को मनुष्य समझ कर व्यवहार करना चाहिए इसके विपरित जाति-पाति, ऊँच-नीच भावना रख कर किसी के साथ व्यवहार नही करना चाहिए।

कबीरदास जी ने समाज हितैसी स्वर को कई स्थानों पर कहा जैसे:- 

(क) धार्मिक कुरीतियों व आडंबर का खंडन।

(ख)जाति - पति व भेदभाव का खण्डन।

(ग)संगति का प्रभाव

(घ)प्रेमभाव का महत्व ।


(क) धार्मिक कुरीतियों व आडम्बर का खण्डन।

कबीरदास जी ने कई स्थान पर हिंदुओं के धार्मिक कुरीतियों पर घात करते हुए कहा है:- 

पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार ।
तोते ये चक्की भली जो पीस खाए संसार ।।

तथा मुसलमानों की कुकृतियों  पर कहा है:- 

कंकड़ पत्थर जोरि कै मस्जिद दिया बनाय।
ता चढ़ मुल्लाबाग है क्या बहरा हुआ खुदाय।।

अतः इस प्रकार से जाना जा सकता है कि कबीरदास जी धर्म के आड़ में जो आडम्बर होती है उनके घोर विरोधी थे।

(ख) जाति-पाति व भेदभाव का खंडन।

कबीरदास जी जाति- पाति व भेदभाव की व्यर्थता बताते हुए कहते हैं:-

जात न पूछो साधकी, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥

कबीरदास जी भेदभाव की नीति को चोट करते हुए कहते हैं:- 

ऊँचे कुल क्या जनमया जे करनी उंच न होइ
सोवन कलस सुरै भरवा , साधु निंद्या सोइ ।।

कबीरदास जी ऐसे कहते थकते व रूकते नही वे मुसलमानों पर कड़े स्वर से कहते हैं :-

जे तू तुरक तुरकनी जाया,
तो भीतरी खतना क्यू न करया।।

इस प्रकार से संत कवि कबीरदास जी समाज विरोधी तत्व को खण्डन करते रहे।

(ग) संगति का प्रभाव।

कबीरदास जी समाज का हित के लिए व्यक्तिकाऊपर संगति का प्रभाव से जो व्यक्तित्वका निर्माण होता है और जिससे समाज प्रभावित होता है या कहा जाए कि समाज निर्माण होता है,इसका ज्ञान कबीरदास जी को था इसलिए संगति का प्रभाव के विषय में कबीर कहते हैं:- 

कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होई।
चंदन होसी बावना, नीम न कहसी कोई।।

(घ) प्रेमभाव का महत्व।

संत कवि कबीरदास जी ने प्रेमभाव को महत्व देते हुए कहते हैं कि हम सभी एक ही परमात्मा के संतान है, हम सब को किसी भी प्रकार भेदभाव को मिटा कर या भूल कर मनुष्य को एक- दूसरे के साथ मिल-जुल कर  प्रेमभाव से रहना चाहिए,किसी को जात-पात, छु-छुआत के अधार पर नीचा नही दिखाना चाहिए जिससे एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके , कबीर कहते हैं:- 

पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ , पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का ,पढ़े सौ पंडित होय ॥

अतः इस प्रकार से संत कवि कबीरदास जी समाज के लिए उचित मापदंड स्थापित करते रहे कारणवश कबीरदास जी का कवि के साथ-साथ एक समाजसुधारक रूप स्पष्ट हो जाता है ।