अचार्य रामचंद्र शुक्ल तथा डॉ०श्यामसुंदर दास के अनुसार कबीरदास का जन्म काल 1456 वि संवत माना तथा निधन काल 1557 वि संवत माना। जबकि डॉ०राजकुमार वर्मा के अनुसार जन्म काल 1455 वि संवत माना तथा निधन काल 1551 वि संवत माना , डॉ०पारसनाथ तिवारी ने कबीरदास जी का जन्म काल 1462 वि संवत तथा निधन काल 1575 वि संवत माना ।
अतः हम विभिन्न विद्वानों के अधार पर कबीरदास जी का जीवन परिचय जान सकते हैं।
(क) अंतसाक्ष्य
(ख) बाह्यसाक्ष्य
(ग) किवदंती व जनश्रुति
(क) अंतसाक्ष्य: अंतसाक्ष्य के अन्तर्गत कबीरदास जी का विभिन्न प्रकार के दोहा शामिल है जिसके माध्यम से कबीरदास का परिचय उजगार होती है।
जैस:-
(1) जन्म: काशी (उत्तरप्रदेश वाराणसी)
कबीर पंथियों में प्रचलित दोहों के अनुसार उनका जन्म से संबंधि बातों का पता चलता है:-
"सांवत बारह सौ पाँच में ज्ञानी कियो विचार।
काशी में प्रगट भयो,शब्द कहो टकसार।
कबीर के और एक दोहे में कहा गया है:-
"चौदह सौ पचपन साल गए, चंदवार एक ठाट ठाए।
जेठ सुदी बरसायत को, पूर्णमासी प्रगट भए।
घन गरजे दमनी दमके, बूंदे बरसे झरलाग गए
लहर तालाब में कमल खिलि है, तहँकबीर भानूप्रकाश भए।"
डॉ०पारसनाथ तिवारी प्राप्त शिलालेख के अनुसार जन्म संवत 1462 माना।
(2) निधन: मगहर
डॉ०श्यामसुंदर दास, अचार्य रामचंद्र शुक्ल, डॉ०राजकुमार वर्मा ने कबीरदास का निधन काल संवत 1575 माना। एक दोहे के माध्यम से यह सर्वमान्य है जो इस प्रकार है:-
"सांवत पन्द्रह सौ पछन्तरा , कियो मगहर को गावन ।
माघ शुदी एकादशी, रासो पवन में पवन।।"
मान्यता है कि कबीरदास का मृत्यु मगहर में हुआ।
(3) जाति:- जुलाहा
निम्नलिखित दोहे से पता चलता है कि संत कवि कबीरदास जी जुलाहा थे तथा उनके वहां ताने- बाने का काम होता था।
"गुर परसग्दी जदै ऊनामा
भगति के प्रेम इन्हहि नहै जाना ।।"
(4) शिक्षा:-
संत कवि कबीरदास जी का शिक्षा के बारे कहा जाए तो वे पढ़े-लिखे नहीं थे या अनपढ़ थे तथापि वे प्रतिभा के इतने धनी थे कि उन्होने जो कह दिया वही उनकी रचना बन गई, कबीरदास जी ने जो भी कहा उसे उनके शिष्य धर्मदास ने लिख लिया जिसको हम बीजक के नाम से जानते हैं ।
शिक्षा से संबन्धित उनका एक दोहा इस प्रकार है:-
" कागद छुओ नहिं , कलम गही नही हाथ ।
चारिक जुग को महतम , मुखहिं जनाई बात ॥"
(ख) बाध्यसाक्ष्य:-
बाह्यसाक्ष्य के अंतर्गत कबीरदास जी कराजनिकाल तथा जीवनवृत के संबंध में उल्लेख मिलता है। भक्तमाल में कबीरदास से संबंधि जो छाप्य मिले उससे ज्ञात होता है कि कबीरदास जी भक्तमाल के रचना से पूर्व ही अस्तित्व में आ गए थे। उनके गुरु रामानंद जी थे, उनकी दीर्घायु 120 वर्ष की थी,कुछ बातों का पता अनंतदास की रचना कबीर साहब की परचई रचना काल संवत 1842 के अनुसार सामने आई । आईन-ए-अकबरी ' अबुल फजल रावनाकाल वि संवत 1655 के अनुसार कबीरदास जी हिंदू और मुस्लिम दोनो के पूज्य थे उनके अंतिम संस्कार के लिए दोनो पक्ष में विवाद हुआ।

