संत कवि कबीरदास जी 15वी सदी का एक कवि होने के साथ - साथ एक समाज सुधारक भी थे, उन्होंने समाज में उपस्थिति विभिन्न प्रकार के समाज विरोधी तत्त्वों का खंडन कर समाज को उचित दिशा में ले जाने का प्रयास किया है।
संत कवि कबीरदास जी, समाज में उपस्थिति विभिन्न प्रकार के समाज विरोधी कुरीतियां तथा भेदभाव जैसे - ऊँच-नीच, जाति-पाति , धार्मिक आडम्बर व रुढ़िवादिता का घोर विरोधी थे ।
कुरीति, अनीति ,भेदभाव का खंडन, कबीरदास का समाज में योगदान है और इसलिए कबीरदास का समाज दर्शन की प्रासंगिकता आज भी बनी हुई है।
कबीरदास जी सभी को एक ही परमात्मा का संतान मानते हैं उनके दृष्टि से कोई बड़ा या छोटा जन्म या जात से नही बल्कि कर्म से होता है।
कबीरदास जी ने प्रेम का बड़ा महत्व समाज की उन्नति के लिए दिया है अर्थात विभिन्न प्रकार की आपसी मतभेद को छोड़ कर मनुष्य को मनुष्य समझ कर व्यवहार करना चाहिए इसके विपरित जाति-पाति, ऊँच-नीच भावना रख कर किसी के साथ व्यवहार नही करना चाहिए।
कबीरदास जी ने समाज हितैसी स्वर को कई स्थानों पर कहा जैसे:-
(क) धार्मिक कुरीतियों व आडंबर का खंडन।
(ख)जाति - पति व भेदभाव का खण्डन।
(ग)संगति का प्रभाव
(घ)प्रेमभाव का महत्व ।
(क) धार्मिक कुरीतियों व आडम्बर का खण्डन।
कबीरदास जी ने कई स्थान पर हिंदुओं के धार्मिक कुरीतियों पर घात करते हुए कहा है:-
पाहन पूजै हरि मिले तो मैं पूजूँ पहार ।
तोते ये चक्की भली जो पीस खाए संसार ।।
तथा मुसलमानों की कुकृतियों पर कहा है:-
कंकड़ पत्थर जोरि कै मस्जिद दिया बनाय।
ता चढ़ मुल्लाबाग है क्या बहरा हुआ खुदाय।।
अतः इस प्रकार से जाना जा सकता है कि कबीरदास जी धर्म के आड़ में जो आडम्बर होती है उनके घोर विरोधी थे।
(ख) जाति-पाति व भेदभाव का खंडन।
कबीरदास जी जाति- पाति व भेदभाव की व्यर्थता बताते हुए कहते हैं:-
जात न पूछो साधकी, पूछि लीजिए ज्ञान ।
मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान ॥
कबीरदास जी भेदभाव की नीति को चोट करते हुए कहते हैं:-
ऊँचे कुल क्या जनमया जे करनी उंच न होइ
सोवन कलस सुरै भरवा , साधु निंद्या सोइ ।।
कबीरदास जी ऐसे कहते थकते व रूकते नही वे मुसलमानों पर कड़े स्वर से कहते हैं :-
जे तू तुरक तुरकनी जाया,
तो भीतरी खतना क्यू न करया।।
इस प्रकार से संत कवि कबीरदास जी समाज विरोधी तत्व को खण्डन करते रहे।
(ग) संगति का प्रभाव।
कबीरदास जी समाज का हित के लिए व्यक्तिकाऊपर संगति का प्रभाव से जो व्यक्तित्वका निर्माण होता है और जिससे समाज प्रभावित होता है या कहा जाए कि समाज निर्माण होता है,इसका ज्ञान कबीरदास जी को था इसलिए संगति का प्रभाव के विषय में कबीर कहते हैं:-
कबीर संगति साध की, कदे न निरफल होई।
चंदन होसी बावना, नीम न कहसी कोई।।
(घ) प्रेमभाव का महत्व।
संत कवि कबीरदास जी ने प्रेमभाव को महत्व देते हुए कहते हैं कि हम सभी एक ही परमात्मा के संतान है, हम सब को किसी भी प्रकार भेदभाव को मिटा कर या भूल कर मनुष्य को एक- दूसरे के साथ मिल-जुल कर प्रेमभाव से रहना चाहिए,किसी को जात-पात, छु-छुआत के अधार पर नीचा नही दिखाना चाहिए जिससे एक आदर्श समाज की स्थापना हो सके , कबीर कहते हैं:-
पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ , पंडित भया न कोय ।
ढ़ाई आखर प्रेम का ,पढ़े सौ पंडित होय ॥
अतः इस प्रकार से संत कवि कबीरदास जी समाज के लिए उचित मापदंड स्थापित करते रहे कारणवश कबीरदास जी का कवि के साथ-साथ एक समाजसुधारक रूप स्पष्ट हो जाता है ।
